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सूर्योदय

Monday, March 20, 2017

वामपंथी आततायी

वामपंथी आतताईयों ने पहले परिवार तोड़ा घर तोड़ा समाज तोड़ा और अब राष्ट्र की सशक्त नींव पर हथौड़ा मार रहे हैं। पर यह हथौड़ा उनका ही अन्त करेगा

जनता का मत ताश नहीं है

जनता का मत ताश नहीं है न शतरंज है कि बाजी लगाया जीत गये जनता तलाशती है तराशती है फिर सजाती है अपनी बाजी और जिताती है उसे जिसे वो चाहती है

आसमान से गिरे खजूर पर अटके

गुदड़ी में कालीन छुपाये गली-गली जो भटके हैं जनता को वश में करने किये जिन्होंने टोटके हैं वही आज देखो आसमान से गिरे खजूर पर अटके हैं

जनता ने जड़ा तमाचा

तुम बाज से झपटे थे वोटों पर नाज कर रहे थे नोटों पर पर जनता ने जड़ा तमाचा खत्म हुआ अब तेरा तमाशा।।

वो गायब हो गये

वो गायब हो गये लेकिन उनको अपना कद भीमकाय लगता रहा समुद्र गटककर चुल्लू भर पानी उनको अपने बचने का उपाय लगता रहा।।

सन्नाटा

आज उन चमचमाती चन्द सड़कों पर गजब का सन्नाटा है जिन्होंने सभी सड़कों की गिट्टी गटक ली थी। सड़क बनाने के नाम पर सिर्फ मिट्टी पटक दी थी।

इसी में जिन्दगी बसती है

जब आप दुःखी हों तब दुःख बोलता है। जब आप खुश हों तो खुशी झलकती है। ये जीवन के सहज मनोभाव हैं जिन्दगी इसी से चलती है इसी में जिन्दगी बसती है

अच्छा है देश आपसे मुक्त हुआ

आशाओं को तलाशते लोग कभी निराशावादी नहीं होते आप निराश हैं अर्थात् आप आशावादी नहीं निराशावादियों से देश नहीं चलता अच्छा है देश आपसे मुक्त हुआ

देश बदल रहा है

देश बदल रहा है। सोच बदल रही है पर कुछ लोग अभी भी जड़ बने हुये हैं उनका हृदय अभी भी जड़ है जंगम है वे बस प्रगतिशीलता का ढोंग रचते रहते हैं।

आपकी रजामन्दी नहीं चाहिये

आपकी मुहर रजामंदी या साथ की उसे जरूरत नहीं व क्योंकि जन-मन और जनमत उसके साथ है। वह व्यष्टिवादी नहीं समष्टि के साथ है।

जनता तुम्हें पहचान चुकी है

तुम्हारे बिलखने से विलाप से रुदन और करुण क्रंदन से अब कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जनता तुम्हारे रंगे सियार बहुमुँहे चेहरे को पहचान चुकी है

भगवा

भगवा भाव भगवा भंगिमा अब तो सबकुछ भगवा है। भगवा ऊर्जा तेज ओज द्युति शक्ति विकास का प्रतीक ह॥ भगवा समन्वय और संस्कार का उत्स है

जगत्

जगत् चलायमान है सचल है चञ्चल है इस चक्र का हर अरा व्यवस्थित है इस व्यवस्था को छेड़ना प्रलय है। इस व्यवस्था के साथ सामञ्जस्य सृष्टि है।

गौरैया का होना संकेत है

गौरैया का होना संकेत है कि अभी भी लोग हैं जो सब दाने खुद ही नहीं चुग जाते बल्कि चुगाते हैं पक्षियों को उनके जीवन के लिए प्रकृति के लिए

कलरव खोजते हुए

बहारें बीत गयीं कलरव खोजते हुए छज्जों को अपना झुकना बेमानी लगने लगा आँगनमें पड़ा अक्षत अछूता रह गया गौरैया आयेगी ये सपना लगने लगा

घोंसला वो बनाती थीं

तिनका जोड़कर घोंसला वो बनाती थी चुगतीथी दानें आँगन से खलिहान से खेतसे सुबह-दोपहर-शाम उसकी चहँक दूर करती थी नीरवता और एकाकीपन

हम अभिनन्दन करेंगे

तुम जलो देशहित हम स्नेह बनेंगे। तुम बढ़ो हम साथ चलेंगे कुछ चिमनियों से प्रदूषित जो आँच दिख रही है तुम उसे दलो हम अभिनन्दन करेंगे।

तनिक इनकी सुधि भी लें

तनिक इनकी सुधि भी लें
जिनकी चहँक से
बचपन गुलजार हुआ करता था।
जिनके कलरव से
भोर-सकार हुआ करता था।
जो उस समय
मनोरंजन करती थीं
जब चलचित्र का संसार
कोसो दूर था।
जो उस समय भी
घर भरा करती थीं
जब जीवन में नीरवता
अपनी कहानी
रचती थी।
जिन्होंने जीवन को
अपने कलरव से
नीरव नहीं होने दिया
आज उनके अस्तित्व पर
घोर संकट है
जिजीविषा अपने पाँव
पछाड़ रही है।
आज उनके
आवास पर संकट है
भोजन पर संकट है।
और अधिक क्या कहें
चमकते घरों में
बसे सभ्य समाज बीच
उन्हें तिनके का भी
संकट है।
तिनके का सहारा
कण और किनकी का सहारा
शुद्ध पेयजल का सहारा
सब छीन लिया है हमने
और बचपन की चहँक को
चमक में खोकर
बेसहारा
छोड़ दिया है हमने।

यह अनुगूँज दूर तक जायेगी

अबकी मंदिर में
घंटा और घड़ियाल बजा।
अद्भुत नाद-निनाद उठा।
यह अनुगूँज दूर तक जायेगी।
भारत-भाल सजायेगी।

कोई बात नहीं तुम जड़ बनोगे

कोई बात नहीं
तुम जड़ बनोगे
तो बनो
पर याद रखो
जड़ बनोगे
तो सड़ जाओगे
अच्छा है
कुछ लोगों का
सड़कर अपघटित होना
जरूरी है
एक लहलहाती फसल के लिए।

लोग

कुछ लोग
इकाई होकर
दहाई, सैकड़ा, हजार
दसहजार,लाख,दस लाख
का दम्भ भरते हैं
पर जनता उन्हें
इकाई से पहले
बायीं ओर का
शून्य समझती है।
इसलिए
महत्वपूर्ण मुद्दों पर
जनसरोकारों पर
उनके विचारों को
तुच्छ और न्यून
समझती है।

बेचारे

चार प्रकार के प्राणी होते हैं
जरायुज
अण्डज
उद्भिज
और स्वेदज।
स्वेदज में आते हैं
जूँ, चीलर और पिस्सू
आजकल इनका
राशनकार्ड से
नाम कट गया है।
और ये
छटपटा रहे हैं
बिलबिला रहे हैं
भूख से....

कमल खिलना इतना आसान नहीं था

कमल खिलना
इतना आसान नहीं था।
क्योंकि हरे-नीले शैवालों ने
छेक रखा था सरोवर।
... पर उन्हीं के बनाये
कीचड़ में सुगंध फैलाने
खिल उठा कमल।
उन्हें अखर रहा है कि
उनके सशक्त शैवाल
जो जकड़े थे
सरोवर की प्राणवायु को
आखिर सड़ कैसे गये?
पर जकड़न में सड़न
पलती है।
सड़न से अपघटन होता है
अपघटन से नव-सृजन होता है।
यह शाश्वत सत्य है।

देश उनका अस्तित्व भुला रहा है

रंग बदलते-बदलते
इतने बदरंग हुये कि
अब अपने ही उन्हें
पहचान नहीं पाते।
बहुत से अपने
साथ छोड़ गये,
जो साथ हैं वे सोच रहे
काश! हम भी साथ छोड़ जाते।।
खैर...
विस्मृत हो जाने का गम उन्हें सता रहा है
देश उनका अस्तित्व भुला रहा है।।

अब सूखेगीं नहीं नदियाँ

वो कोई और दिन थे
जब सैफई पर जाकर
सिमट जाती थी नदियाँ।
सूख जाता था पानी
सैफई को सींचकर।
अब बीत गये वो दिन
अब अपने-अपने गंतव्य को
पहुँचेगीं नदियाँ
अपने हिस्से के पानी से भरी हुयी।
अब सूखेगीं नहीं
बस जमीं का टुकड़ा सींचकर
क्योंकि अब उन्हें सींचना है
सोखाना नहीं स्वयं को।

व्यथा और मनोदशा

पत्ता-पत्ता सूख गया
तना-तना है तार हुआ।
फिर भी सत्तालोलुपता में
मेरा मन सस्ता हो बेजार हुआ।।

इस होलिकोत्सव पर...

इस होलिकोत्सव पर...
होलिका-दहन हुयी
प्रह्लाद का नवजीवन मिला
समाज के जन-जन का
उसे समर्थन मिला।।
एक बार फिर
अन्याय का हिरण्यकशिपु
पराजित हुआ।
एक बार फिर
न्याय-धर्म का प्रह्लाद
विजित हुआ।।

इस होलिकोत्सव पर....
इन्द्रधनुषी रंग औ
फाल्गुनी बयार हो
गुझिया, खुरमा
नमकपारा, शकरपारा
चिप्स, कचरी, पापड़
लौंग, इलायची, सौंफ
इत्र और पान के संग
घर-घर स्वागत हो
हो स्नेह-मिलन
भेंट - अँकुवार।
मनमुटाव छोड़कर
मिले सबका स्नेह-दुलार।
पूर्ववत् स्थापित हो कर्तव्य
पूर्ववत् मिले अधिकार।
द्वेषभाव भूलकर
व्यक्ति स्नेहसिक्त हो।
दुर्भावना छोड़े सभी
सौहार्द्र की अभिव्यक्ति हो।
जन-जन में प्रवाहित हो
समन्वय की भावना।
होलिकोत्सव की
हार्दिक शुभकामना।।

चित्त फाग हो गया

मनमयूर नाच उठा
चित्त फाग हो गया।
इस बार
सच्चे अर्थों में होलिका जली
और प्रह्लाद बच गया।
दम्भी हिरण्यकशिपु
हाथ मलता रह गया।

कमल खिला है

सूरज उगा है
उस क्षितिज पर
जहाँ प्रकाश के कतरे की
तरस थी।
कमल खिला है
उस सर में
जहाँ शैवालों की
दमघोंटूँ गन्ध से
जनता बेबस थी।
अब बेबसी नहीं
विकास होगा।
जीवन-स्तर उठेगा
सच में प्रकाश होगा।

प्रतीक्षा प्रभात के सूरज की...

प्रतीक्षा प्रभात की...
कौन खिलेगा
कौन मुरझायेगा
कौन सूखेगा
कौन डूबेगा उदासियों में
कौन जीत पर इतरायेगा।
कौन होगा मँझधार में
किसको मिलेगा किनारा
यह बतायेगा
विहान का सूरज
प्रतीक्षित सबेरा।
जनता को सिकुड़ते
सरोवरों के युग में
कमल पसन्द है
या इस रफ्तार के समय में
पंचर पहियों की
घिसटती साईकिल।
या पसन्द है
आज की
घरों से सिमटकर
फ्लैटों में बसती
आज की पीढ़ी को
द्वार पर हाथी बाँधना।
या स्वयं सहारा ढूँढ़ते
पंजे की निःशक्त
अंगुलिका पकड़ना।
विहान बतायेगा कि
पंजे ने साईकिल को सोखा
या साईकिल ने पंजे को झटका।
हाथी हाँकने लगा
या कमल खिल उठा।
जनता ने किसे उठाया
किसे पटका
किसको लगा तेज तमाचा
किसने झेला
करारा झटका।
सब सामने होगा
प्रतीक्षा प्रभात की...