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सूर्योदय

Saturday, July 16, 2016

समय चक्र बदलता है

कभी एक पल महापल बन जाता है।
मन-हृदय विकल हो घबराता है।
अनिश्चय के बादल निश्चय पर छाते हैं।
विचारों के झंझावात आते हैं, जाते हैं।
मन की शाखों को झिझोंड़कर दहलाते हैं।
समय चक्र बदलता है धूप धूल में
वही झंझावात मधुर स्मृति बन जाते हैं

हम चन्दन हैं

हम चन्दन हैं
तुम चन्दन हो
हम-तुम दोनों चन्दन हैं।
पर यह भुजंग सरीखा कौन खड़ा है
जिसने हमको आधार बना
वैमनस्य का महल गढ़ा है।।

मौलिकता


अपनी परिभाषाओं के
स्वयंभू साँचों में
हम दूसरों को कब तक
भला परिभाषित करेंगे?
कब हम जला पायेंगे
वे आत्मनिर्भर दिये
जो स्वयं स्नेह-सिंचित करेंगे?
कब हम छोड़ेंगे लत
बेवजह बैसाखियाँ लगाने की?
कब मौलिक होगी प्रक्रिया
सीखने- सिखाने की?