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सूर्योदय

Friday, January 23, 2015

कन्या भ्रूण हत्या: मुखर होती एक मूक वेदना

ये आँख तरेरे खड़े हुये जो,
बिन भगिनी के बड़े हुये जो
क्या देश के कर्णधार बनेंगे?
नारी-रहित धरा को करके
क्या अपनी सन्तति स्वयं जनेगें?
मरा हुआ पानी आँखों का
तनिक सजल हो झाँक उठे।
इनके भी मन में हे ईश्वर
मानवता फिर जाग उठे॥
समझ सकें ये मूक वेदना
कुसुमन से पहले मुकुलन की।
समझ सकें सृष्टि-चक्र यह
आधारभूमि इस जीवन की॥

Saturday, January 17, 2015

शुरुआत

यह रात नहीं,
प्रभात है।
धुँधलका कुछ जरूर है
इस डगर में,
लगता है हम अभी भी
ठहरे हैं प्रथम पहर में,
पर यह कौन सी नयी बात है
अन्तिम छोर पर ही
छिपी सदा शुरुआत है॥

रचनाशाला

अनुपम को उपमा देकर भी अनुपमेय बना डाला।
अपने वर्णन से अपरिमित को परिमेय बना डाला।
जीवन-सत्ता को तूलिका से सजा-धजाकर,
स्नेह का तिल-तिल जलाकर रची नयी रचनाशाला॥

हँसी

जब हँसी के दिन उदासी में बदल जाते हैं,
तो मानसर के हंस भी काक नजर आते हैं।
हँसी की लहरों पर उदास पहरे हैं
उदासियों के पैर समुद्र से भी गहरे हैं॥
पर इन पैरों में जंजीर लगायेगी हँसी।
पतझड़ में बासन्ती गीत गायेगी हँसी॥
उड़े हंस जिस मानसर से उसे फिर से
हंसों की हँसी से चँहकायेगी हँसी॥

Sunday, January 11, 2015

अभिव्यक्ति

शब्दों के झरने से
जब अभिव्यक्ति झरती है।
विचारों की वायु
जब हिलोरें भरती है।
तब हर पुष्प अपने मकरन्द की
एक छाप छोड़ जाता है।
यह कालजयी बटोही
काल के माथे पर एक पदचाप छोड़ जाता है॥

क्रान्ति का शार्ली

अब भावनायें भी बिकेगीं थोक के व्यापार में।
संवेदनायें भी दिखेंगी अब खुले बाजार में॥
कराहटों औ करवटों की लगेगीं बोलियाँ,
हास औ परिहास पर अब बरसेंगीं गोलियाँ॥
शब्द घायल होंगे अब, वाक्य होंगे छलनी।
अभिव्यक्ति पर अब सदा बन्दूक होगी तनी॥
पर यह सच है वे कलुषित करेंगे सुबह की हर लाली,
फिर भी कण्ठ-कण्ठ बन जायेगा क्रान्ति का शार्ली॥

Wednesday, January 7, 2015

विस्तीर्ण सिन्धु

चमकतीं ताराओं सी आँखें
आंखों में अतुलित विश्वास।
सैकत पर फैली चन्द्रिका
स्नेह सिक्त हास-परिहास।
सागर लघु-दीर्घ तरंगों औ
आघूर्णों आवर्तों का वास।
झलकता इसकी वीथी से
सदियों से संचित विश्वास।
कोई नही तरल है उससे,
कोई नहीं सरल है उससे,
यह विस्तीर्ण सिन्धु उसका प्रकाश॥

Sunday, January 4, 2015

संकल्प-वर्तिका

संकल्पो की वर्तिका;
भावना का स्नेह भरा।
आलोकित मानस,
प्रज्वलित है दिया॥
उज्जवल ललाट की
उज्ज्वल प्रभा बुलाती।
मानस के मोती को
सर-समुद्र खोजती॥
भटकाव खोज हित
एक बार फिर कस्तूरी के।
एक बार फिर से
तार जुड़े दूरी के॥

भावना

आज ऐसी क्षीण रेखा,
भाव गति को मन्द देखा।
बह पड़ी वह भावना सी
एक मधुर उलाहना सी।
चन्द्रिका के विकल्प हित
शशियूथ वह सजा था।
मनोरम चाँदनी का
मूक वह प्रत्युत्तर था।।
नूपुरों सी हैं खनकती
उर्मियाँ इस महोदधि की।
केसर-अगरु सी महकतीं,
वल्लरियाँ स्नेहनिधि की॥
भाव की हर अर्चना हैं
अर्चिता भी भावनायें।
क्षितिज के इस पार से
उस पार तक चलती हवायें॥
इन हवाओं की विविधता
आजतक कुछ बोलती है।
सृष्टि के अनगिनत पहलू
बुनती औ खोलती है॥

समय चक्र


जरूरी,
गैरजरूरी हो जाता है।
गैरजरूरी,
मजबूरी हो जाता है।
कभी-कभी
समय चक्र बदलता है
और
किनारा धुरी हो जाता है॥

सहमीं दोपहरें हैं

चिरागों के शहर में अंधेरा छाया है।
चुपके से कहीं कोई बहुरूपिया आया है।
आफताब की जरूरत भी ज़रा मन्द है,
जुगुनुओं की रोशनी में सूरज चौंंधियाया है।।
शागिर्द बेबस है, बदतमीज हैं नज़रें।
नजरों की अठखेलियों पर कड़े पहरे हैं,
रात के अंधेरे साये में रहने को मजबूर,
सूरज की रोशनी में भी सहमीं दोपहरें हैं।