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सूर्योदय

Monday, December 29, 2014

कभी भक्त होते, कभी भागते हैं।

कभी भक्त होते, कभी भागते हैं।
लोक की रीति है, अवसर ताकते हैं॥
कभी सिर आँखों पर, कभी आँख सिर पर।
बदल जाते हैं, जैसे बदलता है अवसर,
त्याज्य वस्तु सा, न तनिक ताकते हैं।
कभी भक्त होते कभी भागते हैं॥
बारहों मौसम की बरफ यहाँ जमती।
महफिल भी सजती और उजड़ती॥
कोयल की कूक और कौवे के काँव से,
यह महफिल सजती वीरान होती॥
वीरानियों में भी बसन्त छा जाता,
गरीबी यहाँ कभी धनवान होती॥
बदलती है पूजा बदलते देवता यहाँ
सिसकियों के बदले होता कहकहाँ।
यहाँ लोग बस ताकतों को ताकते हैं ।
कभी भक्त होते, कभी भागते हैं॥

Monday, December 22, 2014

शह देने वाले दहशत में हैं


दीवारें भी दहशत में हैं,
चट्टाने भी दहशत में हैं।
बेखौफ हवायें नहीं रहीं
शह देने वाले दहशत में हैं॥
कल तक मिटाते प्यास रहे
औरों के रुधिरों से जो,
अपना रुधिर बहता देख
देखो कैसे दहशत में हैं।
बारूदी गन्धें साल रहीं
रह-रहकर चीख-पुकार मची।
उठ रहीं लपट स्वाहा करने
बारूद बनाने वाले दहशत में हैं।।
दूसरों के घर की खुशी छीनते
अपनी खुशियाँ चली गयीं।
अपनी ही तलवारें देखो
करने लगीं उन्हें छलनीं॥
अपने ही पाले दहशतगर्दों से
वे देखो कैसे दहशत में हैं।।
दूसरे के लिये कुआँ खोदा
औंधें मुँह गिरे उसी में।
अपने ही लगा ले गयें
सेंध उसकी हँसी-खुशी में॥
अब खुशियों को छिनता देख
षड्यन्त्री भी दहशत में हैंं।

स्पन्दन...स्नेह पराग है

पता नहीं क्यों
हर स्पन्दन,
लगता है
नव-अभिनन्दन।
अंकुर का हर
अभिनव अभिनय
लगता है
कर खोले किसलय॥
आगत और
अनागत भूले
समय-चक्र में
हम सब झूले।
लुप्त हुयी
सूची अपनी
हम अपनी
अभिलाषा भूले।
दृष्टि-पटल पर
कण्ठ-कण्ठ पर,
एक राग है...
हे जीवन
तुम पुष्प हो,
स्नेह पराग है...
एक राग है...

Saturday, December 6, 2014

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के सृजन एवं दर्शन शक्ति को विहंगम, विस्तृत फलक प्रदान करने एवं उसका राष्ट्रवन्दन-स्वरूप गढ़ने वाले शिल्पी प्रा. यशवन्तराव केलकर जी की पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धाञ्जलि में समर्पित कुछ पंक्तियाँ....
राष्ट्रहित जीवन समर्पित
समर्पित हर वन्दना।
ध्येय मार्ग का निरन्तर
गतिमान पथिक बना॥
राष्ट्र की सेवा-साधना,
मन में निज ठान ली थी।
स्नेह का हर बिन्दु अर्पित,
वर्तिका यह जानती थी।
स्नेह-सिंचित वाटिका यह
श्यामला हो पुलक तक ।
अनवरत संधान सज्जित
बढ़ेगी निज ध्येय पथपर॥
कर्मवीर श्रेष्ठ जीवन,
देशहित अनुराग देगा।
दीप की लौ मन्द हो न
वह निरन्तर आग देगा॥
भर रहा नित चेतना को,
संवेदनायें भी जागती हैं।
गढ़े एक सृजन पथ फिर
मन में वे ठानती हैं॥
आज परिषद्-पुण्यसलिला
नित-निरन्तर बह रही है।
ध्रुवतारा सी अटल वह,
राष्ट्रहित में नित खड़ी है॥
कर्मनिष्ठ की वह लगन जो
थी ध्येयनिष्ठा को समर्पित।
हम आज वही भाव लेकर,
कर रहे श्रद्धासुमन अर्पित
अनगिन पुष्प औ पराग सज्जित
सुरभित हो आज बढ़ रहे हम।
इस यशस्वी महापुरुष के,
साकार स्वप्न कर रहे हम॥
इस ऊर्जापुञ्ज की ऊर्जा
अजस्र हममें बह रही है।
इसी की यशोगाथा,
आज परिषद् कह रही है॥

Wednesday, December 3, 2014

पीढ़ियाँ क्षमा नहीं करेंगी...

स्पष्ट हस्ताक्षर बन करके
समय की शुष्क शिला पर
नाम-रूप-अस्तित्त्व मिटाकर
छोड़ गये तुम मानवता का
सहज जटिल प्रश्न धरा पर॥
आँखों के आँसू सूखे थे,

पलकों के पट रूखे थे,

हृदयों में था हाहाकार
व्यथा वेदना पारावार॥
वह भी एक धधक उठी थी
श्वासों की हर धौंक रुकी थी।
काल के पास न काल था इतना
कि मन में कोई विचार उठे,
कोई चीख-पुकार उठे।
महाभयंकर क्रूर कथा है,
मानव ने ही स्वयं रचा है॥
कसीदों में मलमल में सोने वालों
खून पसीना पीने वालों
तेरी करनी को भुगते वे,
अंगार आज भी सुलगते वे,
हरे रहेंगे घाव सदा ये,
तने रहेंगी भृकुटी-भृकुटी।
रहेगी याद दिलाती
बिकते जीवन-मूल्यों की,
पहचान बनी भोपाल त्रासदी॥