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सूर्योदय

Saturday, August 30, 2014

प्रकृति

अनगिन लड़ियाँ,
नव-अंकुर
नव कोपल,
नव-नव पंखुड़ियाँ।
ताम्र-पल्लवों से
सज्जित
प्रफुल्लित
प्रमुदित
विहँसित
वन-वाटिका-वल्लरियाँ॥

क्षणिक अनुराग।

राग-विराग
क्षणिक अनुराग।
अन्ततः बनता जो अनुताप
जीवन का सह्य-असह्य सन्ताप।
न थाह, नहीं कोई परिमाप॥
अपनी ही है रचित तूलिका
अपना ही रचना-विस्तार।
अपने ही बहुरंगी पन्ने,
अपना ही उनका आकार,
फिर क्यों इतना हाहाकार?
फिर क्यों इतनी लयहीन उर्मियाँ,
ज्वालाओं का पारावार?
कर्ता-भोक्ता एक ही जग में
रचता है अपना संसार।
विस्तृत करके सृजन वेदिका
करता उसको तार-तार।
फिर क्यों इतना हाहाकार?