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सूर्योदय

Wednesday, July 2, 2014

वर्षाजल...

सुखकर है ये वर्षाजल,
उठतीँ गिरतीँ बूँदेँ चञ्चल।
आसमान के मेघकोष से
आतीँ देखो बूँदेँ छन-छन।।
यह बिन्दु-बिन्दु है नेह भरी,
अभिसिञ्चित जैसे स्नेह स्वजन।
वर्षोँ की लम्बी विरह-प्रतीक्षा,
अनुभव करती ज्योँ अपनापन।।