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सूर्योदय

Sunday, June 22, 2014

निशा...

निशा सजाये थाल खड़ी है
हीरा, मोती, मणियोँ को।
सोम सोमरस बाँट रहा है
कली और पँखुड़ियो को ।।

Friday, June 13, 2014

जीवन फिर विस्तीर्ण हुआ।।

इधर हृदय के हंस उड़े और,
उधर महासर क्षीण हुआ।
जीवन फिर विस्तीर्ण हुआ।।
पुष्प पुष्प मकरन्द उड़ाकर
 उपवन पवन प्रकीर्ण हुआ।
जीवन फिर विस्तीर्ण हुआ।।

जैसा बोओ वैसा काटो

जो हलाहल बोता है वह अमृत न पीता है।
बात और है वो हलाहल अमृत हमकोि दिखता है।
किसे पता है किसके अन्तस् कितनी पीड़ायेँ सोयी हैँ?
किसे पता है किसकी आँखेँ कितना भीगी रोयीँ है?
किसे पता पथरायी आँखोँ मेँ कितने सुलग रहे अँगारे हैँ?
किसे पता विस्तीर्ण उदधि के कितने पुलिन किनारे है?
निखिल चुनौती अखिल जगत कि हृदय कुञ्ज से झाँक रही है।
झाँक-झाँककर नयी सम्भावना उत्कण्ठा से भाँप रही है।।
                                                  ममता त्रिपाठी