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सूर्योदय

Tuesday, May 27, 2014

ज्येष्ठ में वृष्टि...

वरुणदेव का मधुर हास।.
ज्येष्ठ मेँ श्रावण का आभास।।
रेणु रेणु अब सिक्त हुआ,
व्यथा-भार से मुक्त हुआ।
उदक उड़ेला तप्त धरा पर,
लिया कष्ट करुणा को हर हर।।

हम कालमेघ बन जायेँ।

लक्ष्म नहीँ लक्ष्मी अब आये,
सरस्वती का हो सम्मान। 
विश्वक्षितिज पर विश्वगुरु बन
भारत का चहुँदिशि गुणगान।। 
दीन दरिद्रता कोसो दूर हो,
 कोई न हमेँ आँख दिखाये। 
अगर मेघ बन कोई छाये तो 
हम कालमेघ बन जायेँ।।

सफलता का पहला प्रहर है।


आलोचना का स्वर मुखर है, 
दिवस मेँ सूरज प्रखर है।
अरुण की सप्तवर्णी रश्मियाँ सजाये।
सफलता का पहला प्रहर है।।

Sunday, May 18, 2014

गीत के नवगीत के


संधान से विज्ञान तक विस्तृत जो सारी धरा है।
पुलक औ ललक समेटे यह जो वसुन्धरा है॥
तनिक तो विश्वास कर लो,
तनिक उसका ध्यान धर लो।
जीवन का आधार वह है, तेज का विस्तार वह है।
स्वप्न जितने हैं नयन में स्वप्नों का साकार वह है॥
भागती जो जिन्दगी है, उसकी विश्रान्ति यह।
माँ के अंचल की सौम्य सुख शान्ति यह॥
उदात्त भावों की वीथिका का सृजन सुन्दर।
वार्ताओं के अनगिनत पुलिन औ समन्दर॥
सब संजोये भाल पर चन्द्रिका सा सजाये।
गीत के नवगीत के, छन्द ताल लय गाये॥

Saturday, May 17, 2014

जाग उठा लोकतन्त्र नव-प्राण पाया॥

जनता ने सजाये दिये
गायी प्रभाती
नव विहान आया
कण्ठ-कण्ठ समवेत् हो
मंगलगान गाया।
नव विहान आया।
करने बुझते दीप मे
हर हाथ स्नेहदान आया॥
जाग उठा लोकतन्त्र
नव-प्राण पाया॥

जीवन का सत्य

जीवन का सत्य
झाँकता है एक कोने से जैसे
चञ्चल जल पर प्रतिबिम्ब।
भाव अस्थिर-स्थिर ऐसे
बिन्दु-बिन्दु पर बिम्ब॥
ताम्रवर्ण का किसलय जैसे
तप्त-तृषित रविकिरणों से।
वैसे ही मन की अभिलाषा
खण्डित होती अश्रुकणों से॥

Wednesday, May 14, 2014

मतपत्रों से बोल रही वह

जनमन की जो सोच रही वह
अर्गनी पर अबकी न लटकी।
गुलेल की गोली अबकी
फुनगी पर फिरसे न अटकी॥
लौट-लौटकर सिर फोड़ेगी।
वर्षों की जड़ता तोड़ेगी॥
मौन-मुखर जो रहा भाव हो,
निज स्वभाव पट खोल रही वह।
मुँह से बोले न बोले
मतपत्रों से बोल रही वह॥