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सूर्योदय

Tuesday, February 18, 2014

एक लौ...एक आस

गहन निशा है
तिथि अमावस
न सूझता कुछ
बेबस अन्तस् ॥
पर है एक टकटकी
एक आस
जीवन की लौ
ज्योति की लकीर
बदल देगी तकदीर
सुबह की लाली
लिखेगी नयी गाथा
उस ऊर्जा में खो जायेगा
जीवन का अमावस
गहन निशा
और तिरोहित होगी

सारी व्यथा ॥

राजनीति के प्रश्न...

रोटी की खोज में उलझे हुये
बीत जाते हैं बारह महीने ॥
पर राजनीति का तवा गर्म होने पर
सोचते हैं सभी वे छीने, हम छीने ॥
पतीले का चावल भात बन रहा है
पानी उबलकर भाप बन रहा है ।
हो रहा है विस्थापन पर
यह परिणाम कार्य नहीं है ॥
अबकी बार कोई झूठा वादा-इरादा

जनमानस को स्वीकार्य नहीं है ।