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सूर्योदय

Monday, December 22, 2014

स्पन्दन...स्नेह पराग है

पता नहीं क्यों
हर स्पन्दन,
लगता है
नव-अभिनन्दन।
अंकुर का हर
अभिनव अभिनय
लगता है
कर खोले किसलय॥
आगत और
अनागत भूले
समय-चक्र में
हम सब झूले।
लुप्त हुयी
सूची अपनी
हम अपनी
अभिलाषा भूले।
दृष्टि-पटल पर
कण्ठ-कण्ठ पर,
एक राग है...
हे जीवन
तुम पुष्प हो,
स्नेह पराग है...
एक राग है...

1 comment:

प्रभात said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!