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सूर्योदय

Wednesday, July 2, 2014

वर्षाजल...

सुखकर है ये वर्षाजल,
उठतीँ गिरतीँ बूँदेँ चञ्चल।
आसमान के मेघकोष से
आतीँ देखो बूँदेँ छन-छन।।
यह बिन्दु-बिन्दु है नेह भरी,
अभिसिञ्चित जैसे स्नेह स्वजन।
वर्षोँ की लम्बी विरह-प्रतीक्षा,
अनुभव करती ज्योँ अपनापन।।

4 comments:

रविकर said...

बढ़िया प्रस्तुति-
आभार आदरणीया-

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 03-07-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1663 में दिया गया है
आभार

Asha Saxena said...

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना |

Mukesh Kumar Sinha said...

sundar prasturi, sundar varsha jal !!