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सूर्योदय

Sunday, May 18, 2014

गीत के नवगीत के


संधान से विज्ञान तक विस्तृत जो सारी धरा है।
पुलक औ ललक समेटे यह जो वसुन्धरा है॥
तनिक तो विश्वास कर लो,
तनिक उसका ध्यान धर लो।
जीवन का आधार वह है, तेज का विस्तार वह है।
स्वप्न जितने हैं नयन में स्वप्नों का साकार वह है॥
भागती जो जिन्दगी है, उसकी विश्रान्ति यह।
माँ के अंचल की सौम्य सुख शान्ति यह॥
उदात्त भावों की वीथिका का सृजन सुन्दर।
वार्ताओं के अनगिनत पुलिन औ समन्दर॥
सब संजोये भाल पर चन्द्रिका सा सजाये।
गीत के नवगीत के, छन्द ताल लय गाये॥

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (19-05-2014) को "मिलेगा सम्मान देख लेना" (चर्चा मंच-1617) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक