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सूर्योदय

Monday, April 21, 2014

आचमन अब हो चुका बस दक्षिणा अब शेष है

धरती की खनक छीनी,
फूलों की महक छीनी,
छीनी जनता की भावनायें,
छीन लिया अधिकार।
यह है कांग्रेस का ’उपकार’ अपरम्पार॥
जनता इसकी अभारी है।
इसीलिये संग्राम अभी भी जारी है।
सौ कौरवों पर आज भी
कृष्ण-पाण्डव भारी हैं।
तख्त और सिंहासन
पलटने की तैयारी है॥
जन-जन कोने-कोने से
आ रही एक ही पुकार
अबकी बार मोदी सरकार॥
पर अब भी कुछ ’दरबारी’
उसी वैभव में खोयें हैं।
सूजी हैं उनकी भी आँखें,
वे भी कुछ-कुछ रोयें हैं॥
पर रुला-रुला ’महरानी’ ने
उन्हें थोड़ा सा पुचकार दिया।
हुये इतना समर्पित ’भाई’
सब कुछ अपना वार दिया॥
आचमन अब हो चुका
बस दक्षिणा अब शेष है।
जनता बतायेगी कांग्रेसियों,
भारत भी एक देश है॥
नाच सकती न बहुत दिन,
उँगलियों पर नचाने से।
विश्वासघात का बदला
चुकाती है ठिकाने से॥
शीश पर शृंगार करती तो
औंधे मुँह गिराती है।
ये जनता है यही
राजा-रंक बनाती है॥
उछलो कितना भी आकाश में
पर गर्तावास का
रास्ता भी यही दिखाती है॥

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (22-04-2014) को ""वायदों की गंध तो फैली हुई है दूर तक" (चर्चा मंच-1590) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Mukesh Kumar Sinha said...

शीर्षक ने ही इस ब्लॉग का फैन बना दिया ......

बहुत बेहतरीन लिखते हो आप !!