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सूर्योदय

Monday, April 21, 2014

हृदय भी कहीं बदला न ले ले

झूठा सरदार बैठाने से
झूठा किरदार निभाने से,
नाटक सफल हो सकता है,
देश नहीं।
लगाम और जाबा से,
गुलाम नियन्त्रित हो सकते हैं,
लोग नहीं॥
जनता तुम्हें बहुत चुकी दुलार।
इस बार मिलेगी दुरुस्त दुत्कार॥
खजानों की सोने की चाबियाँ
छटपटाने लगेगीं।
कुद-ब-खुद जीवधारी बन
जाने लगेगीं॥
किसी कॉर्डियोलॉजिस्ट को सिरहाने बैठाना,
नहीं तो हृदय भी कहीं बदला न ले ले॥ 

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