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सूर्योदय

Sunday, December 22, 2013

विकास या विनाश

जंगल उजड़ते रहे,
उपवन उजड़ते रहे,
खेत और खलिहान उजड़ते रहे...
बस...
अट्टालिकाओं के शहर सजते रहे,
इस सजावट की चाहत में,
बुलबुले बनते और सिमटते रहे ।

देशद्रोही..विषधर...

देशद्रोहियों को गले लगाना
सिर पर चढ़ाना...
और उनको कन्धे पर लेकर ठुमके लगाना..
अब "कुछ" लोगों की नियति बन गयी है ।
ये प्रथम "देशद्रोही" हैं,
अब पहचानों इनको
क्योंकि
इनसे राष्ट्रवाद की ठन गयी है ॥
अब आस्तीन के साँपों को
एक-एक कर निकालना है ।
न कि दूध पिलाकर विषधर पालना है ।

पैसों के गोदाम...

मूल्य सोये हैं,
दाम बढ़ गये हैं ।
जनता के लिये काम नहीं,
पर कुछ लोगों के
काम बढ़ गये हैं...
बिना खाता-बही के
पैसों से गोदाम भर गये हैं ।

सपनें

कोई सपने बेच रहा है,
कोई रहा खरीद,
दिग्भ्रम में उलझी है जनता,
बनती फिरे मुरीद ॥