m

m
सूर्योदय

Sunday, December 22, 2013

विकास या विनाश

जंगल उजड़ते रहे,
उपवन उजड़ते रहे,
खेत और खलिहान उजड़ते रहे...
बस...
अट्टालिकाओं के शहर सजते रहे,
इस सजावट की चाहत में,
बुलबुले बनते और सिमटते रहे ।

देशद्रोही..विषधर...

देशद्रोहियों को गले लगाना
सिर पर चढ़ाना...
और उनको कन्धे पर लेकर ठुमके लगाना..
अब "कुछ" लोगों की नियति बन गयी है ।
ये प्रथम "देशद्रोही" हैं,
अब पहचानों इनको
क्योंकि
इनसे राष्ट्रवाद की ठन गयी है ॥
अब आस्तीन के साँपों को
एक-एक कर निकालना है ।
न कि दूध पिलाकर विषधर पालना है ।

पैसों के गोदाम...

मूल्य सोये हैं,
दाम बढ़ गये हैं ।
जनता के लिये काम नहीं,
पर कुछ लोगों के
काम बढ़ गये हैं...
बिना खाता-बही के
पैसों से गोदाम भर गये हैं ।

सपनें

कोई सपने बेच रहा है,
कोई रहा खरीद,
दिग्भ्रम में उलझी है जनता,
बनती फिरे मुरीद ॥

Tuesday, September 24, 2013

पितरों को अर्पित...

पितृपक्ष पितरों को अर्पित,
उनको श्रद्धासुमन समर्पित ।
उनके प्रति हो कृतज्ञ आज
श्रद्धा का कण-कण समर्पित ॥
अगियारों की मधु-सुगन्ध से,
पुष्पों के बहुरूप-वर्ण से,
आँगन-द्वार-पिछवार सुगन्धित,
हर घर की ड्योढी है सज्जित ॥
प्रथम वस्तु है अर्पित उनको,
पुष्प, दुग्ध, घृत, अगरु, चन्दन ।
सुस्वादु, सरस, मधुमिश्रित,
बहुविधि रुचिभरे व्यञ्जन ॥
इस जीवन के स्थूल सत्य का
सूक्ष्म तत्त्व से साक्षात्कार ।
वेदिका बना यह पितृपक्ष,
संवाहक पितरों का सत्कार ॥
त्याग, तपस्या विनयभाव का
अनुपम यह पखवारा है ।
यह विना किसी पाठ्यक्रम
अद्भुत संस्कारशाला है ॥

Monday, September 23, 2013

रामधारी सिंह ’दिनकर’ जी को उनके जन्मदिन पर सादर नमन...

शोभित साहित्य क्षितिज पर हिन्दी का अनुपम ’दिनकर’।
जिसके ओजस्वी वाणी से जागे वीर शिंजिनी कसकर॥
कर परशुराम की प्रतीक्षा, रश्मिरथी की रश्मि बिखेरी ।
छायी थी प्राची-क्षितिज पर आततायी निशा घनेरी ॥
जागृति को परिभाषित कर जगती में जागृति-बोध भरा।
विश्वासों की शिला बनायी, चट्टाओं सा जोश भरा ।।
स्वतन्त्रता की प्रथम विभा ला ड्योढ़ी पर आसीन किया ।

सामधेनी के स्वर सजाकर देश को स्वाधीन किया ॥

दीपक की एक लौ...

अन्धकार का नाश सदा ही
दीपक की एक लौ करती है ।
चीर-चीरकर तम का आँचल
विपुल विभा को वह भरती है ॥
महत्त्वपूर्ण है स्नेह उसे जो
नित निर्लिप्त सींचा करता ।
तम की छाती भेद सके जो
बैठा वही वेदिका रचता ॥