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सूर्योदय

Monday, August 27, 2012

वर्षा


वन-कानन औ बाग बगीचे,
निज अपने जल से है सींचे ।
भीषण तप्त रवि किरणों को,
छुपा लिया निज तन पीछे ॥
तप्त और बेहाल धरा को,
नवजीवन का दान दिया है ।
निरीह निर्जल नयनों को,
जीवन का वरदान दिया है ॥
साकार सृष्टि सागर से पाकर,
हिमगिरि को भी मान दिया है ।
प्रतीक्षारत प्यासे कण्ठों को,
शीतलता ससम्मान दिया है ॥
प्रेरणास्पद औ रोचक कितना,
तेरे जन्म-बलिदान का किस्सा ।
’परहित हेतु समर्पित होना’,
तुझ से ही है जग का हिस्सा ॥