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सूर्योदय

Tuesday, June 28, 2011

लो आ गयी ऋतु वर्षा मनभावन

पंक्तिबद्ध पिपीलिका, मोहक मयूरनर्तन।

शीतल समीर वाह घोर मेघ-गर्जन।

लो आ गयी ऋतु वर्षा मनभावन।।

हर्षित-पुलकित-प्रफुल्लित है जन-जन।

आशा-विश्वास से आपूरित कृषक-मन।।

भीनीं फुहारों से पतित हुए रज-कण।

तेज बौछारों से धुल गया वन-उपवन।।

हरीतिमा से धूल हटी, सत्वर निखर गयी।

धरती ने मानो पहनी धानी चुनरी नयी।।

द्वार पर खड़ा है सावन मनभावन।

डालियों पर झूले, कजरी का गायन।।

स्वागतम् मेघ बरसो तुम छन-छन।

दूर करो धरती की जड़ता अरु तपन॥