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सूर्योदय

Tuesday, June 28, 2011

लो आ गयी ऋतु वर्षा मनभावन

पंक्तिबद्ध पिपीलिका, मोहक मयूरनर्तन।

शीतल समीर वाह घोर मेघ-गर्जन।

लो आ गयी ऋतु वर्षा मनभावन।।

हर्षित-पुलकित-प्रफुल्लित है जन-जन।

आशा-विश्वास से आपूरित कृषक-मन।।

भीनीं फुहारों से पतित हुए रज-कण।

तेज बौछारों से धुल गया वन-उपवन।।

हरीतिमा से धूल हटी, सत्वर निखर गयी।

धरती ने मानो पहनी धानी चुनरी नयी।।

द्वार पर खड़ा है सावन मनभावन।

डालियों पर झूले, कजरी का गायन।।

स्वागतम् मेघ बरसो तुम छन-छन।

दूर करो धरती की जड़ता अरु तपन॥

Monday, February 21, 2011

करें हम प्रत्यभिज्ञा


शक्तियाँ असीमित,

बस नेत्र हैं निमीलित,

निज पर विश्वास करें,

जीवन में सुवास भरें,

अन्तर्मन मुखरित हो,

क्लेश सब विगलित हो,

क्लान्ति-श्रान्ति त्यागें हम,

फिर एक बार जागें हम,

गहें पावन शिवाज्ञा

करें हम प्रत्यभिज्ञा।।

मुख न कभी म्लान हो,

शक्ति का संचार हो,

लक्ष्य का संधान हो,

जीवनोत्थान हो,

हो सफल प्रतिज्ञा।

करें हम प्रत्यभिज्ञा॥

गरिमा का घट भरे,

रोर पनघट करे,

बटेर फिर रट करे,

कि एक नया विहान हो,

नीला वितान हो,

हो शिव की अनुज्ञा।

करें हम प्रत्यभिज्ञा॥

गौरेया का कलरव,

गायों की नूपुर रव,

नव उल्लास दे,

वधुओं की रुन्झुन

घर को उजास दे,

जगे हमारी प्रज्ञा।

करें हम प्रत्यभिज्ञा