m

m
सूर्योदय

Monday, December 20, 2010

वात्सल्यमयी माँ


वात्सल्यमयी माँ,

एक विभूति है

एक प्रेममयी

विशिष्ट अनुभूति है।

दया, ममता की

वात्सल्य, करुणा की

स्नेहमयी मूर्ति है॥

हमारी तृप्ति में

बसी रहती है

उसकी तृप्ति।

उसके आँचल में ही

मिट जाती है

सारी क्लान्ति, श्रान्ति

बसती है वही शान्ति

और विश्रान्ति।

जाकर वही लौटती है

हमारे मुखकी

आभा एवं कान्ति॥


Sunday, December 12, 2010

कोई लौटा दे

कोई लौटा दे
वे मेरे बीते हुए दिन।
वो सूरज की लाली,
वो बहती हवा,
वो चिड़ियों की बोली,
वो कोयल की कूक,
वो घनी अमराई

वो खुली हुई धूप।
वो बचपन की किलकारियाँ
वो कथा-कहानियाँ
वो सखियों का प्यार॥
वो बड़ों की डाँट-फटकार,
वो प्यार वो दुलार।
वो बचपन हा हठ,
घण्टों मनुहार।
कोई लौटा दे मुझको
मेरे बचपन का प्यार।
रंगों और दीयों से सजा
हर त्योहार।।

घोटाले में क्या फँसे सब कुछ सिमट गया

कीर्ति सब धुल गयी

यश सब मिट गया।

घोटाले में क्या फँसे

सब कुछ सिमट गया।।

मिटाये थे सबूत

बड़े जतन से।

की थी जो गद्दारी

अपने वतन से।

सोचा था

किसी को भनक न लगे

बस मिलते रहे हमें

नित नये तमगे,

नित नये ओहदे,

पर समय से पहले

पाँसा पलट गया।

घोटाले में क्या फँसे

सब कुछ सिमट गया।।

Tuesday, December 7, 2010

वे और हम

मैंने सुना था

उनके बचपन में

सायंकाल पेड़ों के झुरमुट में

कोयलें कूकती थीं।

गोधूलि बेला में

घंटियों की धुन के साथ

गोचरी से, गायें लौटती थीं।

दिया जलते ही,

गाँव की चौपालों में,

सभा बैठती थी।

होती थी बातें

देश-विदेश की,

अपने परिवेश की,

इतिहास की, भूगोल की,

लोक की परलोक की।

घरों के आँगन में,

गीत गाये जाते थे।

कभी बिरहा,कभी फाग,

कभी चैती,कभी कजरी,

कभी आल्हा-ऊदल के किस्से,

सुनाये जाते थे।।

चहँकती रहती थीं राते।

जन-जीवन में थीं,

अनगिनत रसमय बातें।

पर...............

हमारे लिये तो वे बातें

एक स्वप्न हैं,

एक गल्प हैं,

एक कल्पना हैं,

एक किवदन्ती हैं,

हम उन्हें जान तो सकते हैं

पढ़ भी सकते हैं,

पर महसूस नहीं कर सकते।

विचारात्मक धरातल से उन्हें,

अनुभूति में नहीं उतार सकते।

हमारा अनुभव तो वर्तमान है

और उनका अनुभव भूत है।

हमारी समस्या है कि

हम वर्तमान की तुला पर

भूत को कैसे तौलें?

उनकी भी समस्या है कि

वर्तमान के चकाचौंध में

अपने स्वर्णिम अतीत को

वे भला कैसे भूलें?