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सूर्योदय

Sunday, December 12, 2010

घोटाले में क्या फँसे सब कुछ सिमट गया

कीर्ति सब धुल गयी

यश सब मिट गया।

घोटाले में क्या फँसे

सब कुछ सिमट गया।।

मिटाये थे सबूत

बड़े जतन से।

की थी जो गद्दारी

अपने वतन से।

सोचा था

किसी को भनक न लगे

बस मिलते रहे हमें

नित नये तमगे,

नित नये ओहदे,

पर समय से पहले

पाँसा पलट गया।

घोटाले में क्या फँसे

सब कुछ सिमट गया।।

4 comments:

adil farsi said...

बहुत सुन्दर कटाक्ष है

सुलभ § Sulabh said...

घोटालेबाजों का सब कुछ सिमटना अभी बाकि है.
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एक अच्छी रचना!

Main Hoon Na .... said...

घोटालो की महिमा न्यारी

यशवन्त माथुर said...

कोई कितना भी कोशिश करले जो सच है वो एक दिन सामने आना ही है.