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सूर्योदय

Friday, July 31, 2009

दूत का भगवान से प्रश्न

एक दिन दूत ने भगवान से कहा

कि हे भगवान!

तुम तो सर्वज्ञ हो,

सर्वशक्तिमान हो,

तीनो लोकों के ज्ञाता हो,

बताओ

इस समय पृथ्वीलोक की क्या दशा है?

दूत के इस प्रश्न पर

भगवान सोंच में पड़ गये

कुछ देर विचारकर बोले

हे दूतवर!

मुझे कुछ समय दीजिये,

कुछ दिनों की मोहलत दीजिये

मैंने बहुत दिनों से

पृथ्वी की हालत देखी नहीं है

बहुत दिनों से सर्वेक्षण भी नहीं किया है

पहले जाकर

देख आता हूँ

फिर आपके प्रश्न का उत्तर दूँगा।

भगवान का ये उत्तर सुनकर

दूत मन ही मन मुस्काया

और सोंचा के

जब भगवान ही

पृथ्वी के प्रति उदासीन हैं

तो पृथ्वी क्यों न डगमगाये

क्यों न उसकी व्यवस्थाएँ चरमरायें

और अन्ततः ध्वस्त हो जायें।

परिन्दे की यात्रा

सावन आया

फुहारें पड़ीं

भादों भी आ गया

पर ये क्या परिन्दे को

भनक तक न लगी

वे मानसर के पार तक न गये

राहत की उन्हें कुछ आस थी

अन्त तक आस लगाये रहे

पर जान न पाये सावन की आहट

क्योंकि उसकी पहचान

उसकी सारथी

उसकी सखी

बड़ी देर से आई।

आखिर परिन्दों के पास

हम सा कैलेण्डर नही होता।

और तुम आती

आँगन के उस छोर पर
नीम के पेड़ तले
तुम झूला करती थी।
तुम्हारी हँसी-ठिठोली
सुन-सुन कर
पूरी टोली हँसा करती थी।
पर हमें नहीं पता था
कि अबकी सावन में
झूला तरस जायेगा
तुम्हे झुलाने को,
नीम तरस जायेगी
तुम्हें धूप से बचाने को।
प्रभु की लीला अपरम्पार है
उसपर नहीं हमारा अधिकार है,
अन्यथा........
जाकर कण-कण से तलाश लाते तुमको,
और तुम आती
इस सावन मे गीत गाती
सबको हँसाती।