m

m
सूर्योदय

Friday, October 16, 2009

प्रलय होने वाली है

धरती की पुकार सुनकर
धरती की झंकार सुनकर
तार-तार झनझना उठा
रोम-रोम कह उठा
कि.....................
कुछ अभूतपूर्व घटने वाला है
सागर का अन्तस्
धरती का अन्तस्
फटने वाला है
फटकर एकाकार होने वाला है
जग मे हाहाकार मचने वाला है
मतलब क्या?
प्रलय होने वाली है
धरती हिलने वाली है
समुद्र करवट बदलने वाला है
ज्वालामुखी फटने वाला है
सब कुछ एक में मिलने वाला है
मतलब क्या?
प्रलय होने वाली है
वो चिन्गारी जो सागर के गर्भ से उठी थी
जिसने प्रज्ज्वलित किया था
मानवता के अलख को
वो अब बुझने वाली है
एक नीरव धुँवा फैलने वाला है
क्रन्दनों से रहित
नीरवता सहित
मतलब क्या?
प्रलय होने वाली है
खुल रहा है
शंकर का निमीलित
तीसरा नेत्र
सब कुछ समाहित
भरापूरा क्षेत्र
लीन हो रही है अपने स्वरूप में ब्रह्मा की सृष्टि
अपने ही भित्ति पर
उकेरी गयी ब्रह्म की कलाकृति
अपने ही भित्ति में समाने वाली है
जगत् नियन्ता की क्रीडा
अब हो चुकी पूर्ण है
लीलाधर की लीला अब समापन की ओर है
शिव के ताण्डव का शुरू अब रोर है
मतलब क्या?
प्रलय होने वाली है।

2 comments:

Suman said...

शिव के ताण्डव का शुरू अब रोर है
मतलब क्या?
प्रलय होने वाली है।nice

दिवाकर मिश्र said...

वाह ममता, कविताएँ तुम्हारी जबरदस्त होती हैं । बहुत प्रभावकारी हैं । यह कविता भी इसी बात को ताजा और पुष्ट करती है । यद्यपि इस प्रलय का संकेत किस ओर है, यह मुझे नहीं समझ में आया ।