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सूर्योदय

Monday, April 27, 2009

वे दिन.......

उस रात धरती के आँगन में
सुधाकर की रश्मियाँ
नई सुवास से भरकर
चमक रही थीं।
उस दिन धरती के आँगन में
दिवाकर की किरणें
नेये रंग उड़ेल रही थीं।
भीनी-भीनी थी धरती की खुशबू
विहान होते ही
महकता था महुआ
घनी अमराइयों में
चँहकती थी कोयल
बालकों के शोर से
भर जाती थीं गलियाँ
पक्षियों के कलरव से
होती थी शाम और सुबह।
था न कितना अच्छा दिन?
कितना अच्छा समय?
पर किसे पता था?
कि
इस समय को
किसी की नज़र लग जायेगी
और
धूल-धूसरित हो जायेंगे
ये शान्ति भरे दिन
स्वप्न बन जायेगा
पक्षियों कलरव
बस रह जायेगी
समय का आतंकवाद
झेलती हुई ये धरती
मात्र ये धरती
बाट जोहती रहेगी
प्रलय पर्यन्त
कि वे खुशहाल दिन
कब आयेंगे?
कब आयेंगे
एक पुत्रवियोगी माँ सी
पथरायी आँखों से
युगों-युगों तक बाट जोहेगी
अपने बिछुड़े पुत्रों का

2 comments:

SHIVESH KUMAR MISHRA said...

very nice poem you have writen good

SUBHAS said...

kavita ne hridya tal ko chhu liya...bas baki ke kavitaon ke liye kahunga ki kavita ko klatmak hona chahiye, kyunki kavita agar lekh ban jae ya protest ban jae to apni kalatmakta kho deti hai, vaise hi jase yog ko gusse me nahikiya ja sakta hai ya phir badle ki bhavna se atmraksha ki kalayen nahi sikhi ja sakti. vaise ye meri vyaktigat vichar hai, ki manavvadi aur ahinasak vachan matr hi kaphi hai dusro ko apni bat batane ke liye...