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सूर्योदय

Friday, October 16, 2009

प्रलय होने वाली है

धरती की पुकार सुनकर
धरती की झंकार सुनकर
तार-तार झनझना उठा
रोम-रोम कह उठा
कि.....................
कुछ अभूतपूर्व घटने वाला है
सागर का अन्तस्
धरती का अन्तस्
फटने वाला है
फटकर एकाकार होने वाला है
जग मे हाहाकार मचने वाला है
मतलब क्या?
प्रलय होने वाली है
धरती हिलने वाली है
समुद्र करवट बदलने वाला है
ज्वालामुखी फटने वाला है
सब कुछ एक में मिलने वाला है
मतलब क्या?
प्रलय होने वाली है
वो चिन्गारी जो सागर के गर्भ से उठी थी
जिसने प्रज्ज्वलित किया था
मानवता के अलख को
वो अब बुझने वाली है
एक नीरव धुँवा फैलने वाला है
क्रन्दनों से रहित
नीरवता सहित
मतलब क्या?
प्रलय होने वाली है
खुल रहा है
शंकर का निमीलित
तीसरा नेत्र
सब कुछ समाहित
भरापूरा क्षेत्र
लीन हो रही है अपने स्वरूप में ब्रह्मा की सृष्टि
अपने ही भित्ति पर
उकेरी गयी ब्रह्म की कलाकृति
अपने ही भित्ति में समाने वाली है
जगत् नियन्ता की क्रीडा
अब हो चुकी पूर्ण है
लीलाधर की लीला अब समापन की ओर है
शिव के ताण्डव का शुरू अब रोर है
मतलब क्या?
प्रलय होने वाली है।

Friday, July 31, 2009

दूत का भगवान से प्रश्न

एक दिन दूत ने भगवान से कहा

कि हे भगवान!

तुम तो सर्वज्ञ हो,

सर्वशक्तिमान हो,

तीनो लोकों के ज्ञाता हो,

बताओ

इस समय पृथ्वीलोक की क्या दशा है?

दूत के इस प्रश्न पर

भगवान सोंच में पड़ गये

कुछ देर विचारकर बोले

हे दूतवर!

मुझे कुछ समय दीजिये,

कुछ दिनों की मोहलत दीजिये

मैंने बहुत दिनों से

पृथ्वी की हालत देखी नहीं है

बहुत दिनों से सर्वेक्षण भी नहीं किया है

पहले जाकर

देख आता हूँ

फिर आपके प्रश्न का उत्तर दूँगा।

भगवान का ये उत्तर सुनकर

दूत मन ही मन मुस्काया

और सोंचा के

जब भगवान ही

पृथ्वी के प्रति उदासीन हैं

तो पृथ्वी क्यों न डगमगाये

क्यों न उसकी व्यवस्थाएँ चरमरायें

और अन्ततः ध्वस्त हो जायें।

परिन्दे की यात्रा

सावन आया

फुहारें पड़ीं

भादों भी आ गया

पर ये क्या परिन्दे को

भनक तक न लगी

वे मानसर के पार तक न गये

राहत की उन्हें कुछ आस थी

अन्त तक आस लगाये रहे

पर जान न पाये सावन की आहट

क्योंकि उसकी पहचान

उसकी सारथी

उसकी सखी

बड़ी देर से आई।

आखिर परिन्दों के पास

हम सा कैलेण्डर नही होता।

और तुम आती

आँगन के उस छोर पर
नीम के पेड़ तले
तुम झूला करती थी।
तुम्हारी हँसी-ठिठोली
सुन-सुन कर
पूरी टोली हँसा करती थी।
पर हमें नहीं पता था
कि अबकी सावन में
झूला तरस जायेगा
तुम्हे झुलाने को,
नीम तरस जायेगी
तुम्हें धूप से बचाने को।
प्रभु की लीला अपरम्पार है
उसपर नहीं हमारा अधिकार है,
अन्यथा........
जाकर कण-कण से तलाश लाते तुमको,
और तुम आती
इस सावन मे गीत गाती
सबको हँसाती।

Monday, April 27, 2009

वे दिन.......

उस रात धरती के आँगन में
सुधाकर की रश्मियाँ
नई सुवास से भरकर
चमक रही थीं।
उस दिन धरती के आँगन में
दिवाकर की किरणें
नेये रंग उड़ेल रही थीं।
भीनी-भीनी थी धरती की खुशबू
विहान होते ही
महकता था महुआ
घनी अमराइयों में
चँहकती थी कोयल
बालकों के शोर से
भर जाती थीं गलियाँ
पक्षियों के कलरव से
होती थी शाम और सुबह।
था न कितना अच्छा दिन?
कितना अच्छा समय?
पर किसे पता था?
कि
इस समय को
किसी की नज़र लग जायेगी
और
धूल-धूसरित हो जायेंगे
ये शान्ति भरे दिन
स्वप्न बन जायेगा
पक्षियों कलरव
बस रह जायेगी
समय का आतंकवाद
झेलती हुई ये धरती
मात्र ये धरती
बाट जोहती रहेगी
प्रलय पर्यन्त
कि वे खुशहाल दिन
कब आयेंगे?
कब आयेंगे
एक पुत्रवियोगी माँ सी
पथरायी आँखों से
युगों-युगों तक बाट जोहेगी
अपने बिछुड़े पुत्रों का