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सूर्योदय

Tuesday, September 30, 2008

जब मैं आने को कहती हूँ तब................................

जब मैं आने को कहती हूँ
तब................................
तुम क्यों सहम जाते हो?
मैं भी आना चाहती हूँ,
उस गगन तले जिसमें
तुम रहते हो।
मैं भी उस जगत् को
देखना चाहती हूँ,
जिसे तुम देखते हो।
मैं भी उन सुरों को
सुनना चाहती हूँ,
जिसे तुम सुनते हो।
मैं भी वह सब
करना चाहती हूँ ,
जिसे तुम करते हो।
मै भी वो ज़िन्दगी
जीना चाहती हूँ,
जिसे तुम जीते हो।
मैं भी वे सपने
बुनना चाहती हूँ,
जिसे तुम बुनते हो।
पर जब मैं आना चाहती हूँ,
तब तुम सहम क्योँ जाते हो?
मुझे आने क्यों नहीं देते?
मुझे अपना संसार,
ये रंग-बिरंगा संसार,
देखने क्यों नही देते?
आखिर मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा?
फिर तुम क्यों मुझे जीने नहीं देते?
क्यों नही देखने देते,
मुझे प्रभात का सूरज,
जिसके सहारे तुम जीते हो।
मैं भी देखना चाहती हूँ,
वो सूरज।
मैं भी जीना चाहती हूँ,
उसके प्रकाश तले।
पर…..
तुम मुझे जीने क्यों नही देते?
मेरे आने की बात सुनकर
तुम सहम क्यों जाते हो?
क्या सचमुच मुझे जीने का
अब अधिकार नहीं रहा?
तो फिर बताओ
किस न्यायालय में जाकर ,
मैं दरवाज़ा खटखटाऊँ?
जब मेरा अपना कोई
कर्णधार न रहा।
क्या बिगाड़ा है मैंने तुम लोगों का?
जो मुझे इस धरा पर आने नहीं देते?
मुझे भी प्रकाश का एक पुञ्ज पाने नहीं देते?
मैं जब आना चाहती हूँ
तो…….
मेरी आहट सुन सहम क्यों जाते हो?
क्यों काँपने लगते हैं तुम्हारे अधर
क्यों खिंच जाती हैं
तुम्हारे मस्तक पर
चिन्ता की लकीरे?
आखिर क्यों?
मैं जानना चाहती हूँ
कि क्यों तुम मुझे आने नही देते?
तथा मेरे प्रश्नों को निरुत्तरित रखते हो।
मैं इन प्रश्नों का उत्तर चाहती हूँ
तथा इस धरा पर आना चाहती हूँ
आने दो मुझको……………
मुझे भी इसका हक है,
मत छीनो मेरा ,
मत लगाओ उसमें सेंध।
मैं भी जीना चाहती हूँ,
और देखना चाहती हूँ,
प्रभात का सूरज।।

Thursday, September 11, 2008

तब इनका रंग धुल जाता है और जनता ..................

आतंकवाद !
आतंकवाद!
आतंकवाद !
बहुत भयावह लगता है यह शब्द
है न लगता है भयावह !
क्यों न लगे ?
इस वृक्ष की जड़े
रक्त से सींची गयीं हैं
रक्त से पल-पोसकर ये बड़ा हुआ है
जब रक्तिम है इसका
आदि और अन्त
तो भयावह तो लगेगा ही
ये आतंकवादी हैं
कहते हैं कि इनका
जाति और धर्म नहीं होता
बस इनका कर्म ही
होता है इनका धर्म
मुझे समझ में नहीं आता कि
आखिर इन रक्त से सने आतंकवादियों के
सन्दर्भ में
उनके कार्य के सन्दर्भ में
उनकी जाति के सन्दर्भ में
उनके धर्म के सन्दर्भ में
इन तथाकथित
सेक्यूलरवादियों को
उनके स्वनामधन्य आकाओं को
एवं उनके सरंक्षण दाताओं को
कौन सा फार्मूला नज़र आता है?
और यही फार्मूला उस समय क्यों
बदल जाता है?
जब किसी दूसरे संगठन को
जो आतंकवादी नही है
आतंकवाद से
जिसका दूर-दूर तक कुछ लेना-देना नही है
पर आतंकवाद का सख्त विरोधी है
उसको
उसके कार्यकर्ताओं को
उसके गतिविधियों को
आतंकवादी करार देते समय।
उस समय इनका फार्मूला क्यों बदल जाता है ?
तब ये देश , धर्म, जाति से
उसे व्यर्थ में जोड़ने की कोशिश में
ऎड़ी से चोटी का बल क्यों लगाने लगते हैं ?
तब कहाँ चला जाता है
इनका तथाकथित सेक्यूलर चेहरा ?
तब अपनी सेक्युलरिस्ट नकाब उतार
उस संगठन के पीछे बेहया से
क्यों दौड़ने लगते हैं ?
क्या ये
जो यथार्थ में आतंकवादी हैं
मात्र उनके जाति, धर्म ,
देश के बारे में
सेक्यूलर बनकर
उन्हें नज़र अन्दाज़ करना जानते हैं बस ।
क्या ये मात्र एकपक्षीय सेक्यूलर हैं?
या सेक्यूलर बनने का ढोंग रचे रंगे सियार मात्र है
जिनका रंग अचानक उस समय उतर जाता है
और जो उस समय
अपनी सियारबानी हुक्का हुवाँ-हुवाँ हुवाँ
चिल्लाने की कसक
रोंक नही पाते
जब इन्हें कोई
राष्ट्रवादी संगठन
उसके कार्यकर्ता
उसकी गतिविधियाँ मिल जाती हैं
सुई की नोंक घुसाने के लिये
और तब बेचारे ये
अपनी आदत के अनुसार
अपने को रोंक नही पाते
और लगा देते हैं अपना ऎड़ी से चुरकी का बल
उनको आतंकवादी करार देने के लिये
तथा एक स्वर में चिल्लाने को
आतुर हो उठते हैं अपनी लत के अनुसार
तब इनका रंग धुल जाता है और जनता
इनके छद्म सेक्यूलरिस्ट चेहरे को पहचान लेती है ।

Monday, September 8, 2008

जब मेरे पुत्र इन आस्तीन के साँपों के लिये फिर ....................

मैं कभी सोने की चिड़िया था
कभी नन्दनवन था
कभी मैं देवों के लिये मनभावन था
प्रसारित होता था मुझसे......
एकता प्रेम, विश्वबन्धुत्व का संदेश
था मैं शान्ति का प्रतीक
अति पावन था यह भारत देश
पर आज मेरी सीमाएँ सुलग रही हैं
कही माओवादी आग लगा रहे हैं
कही अलगाववादी लोगों को भगा रहे हैं
कहीं आतंकवादी हमको उड़ाने की
योजना बना रहे हैं
कहीं बन विस्फोट हो रहे हैं
कहीं सरेआम गोलियाँ चल रही हैं
कही पर कर्फ्यू लगा है
कही प्रदर्शन हो रहा है
ये सब देख कर
मैं रो पड़ता हूँ
सच में........
आज मैं किसी करुण कवि की
कारुण्यपूर्ण कविता से भी
करुण कविता हूँ
हमनें अपने ऊपर ही पालें हैं
आस्तीन के साँप कई
आज वो हमको
डँसने लगे हैं
हमको हमारी सीमाओं के
संकोच में कसने लगे हैं
सदियों से की गयी सहृदयता का
ये सुपरिणाम है
हमारे अनेक भू-भाग
आज हमारे दुश्मनों के नाम हैं
कभी कभी अपना
पुनरावलोकन भी करने लगता हूँ मैं
तब हमें लगता है कि
कितना ग़लत किया था
इन आस्तीन के साँपों को पालकर
अन्त में बैठ जाता हूँ मै
अपने विचारों से हारकर
और सोचता हूँ
मेरी व्यथा तभी कथा बन सकेगी रामायणी
जब मेरे पुत्र
इन आस्तीन के
साँपों के लिये
फिर ....................
"जनमेजय का नागयज्ञ" करेंगे
और इस बार वे
इन नागों को छिपने का
कोई अवसर नही देगें
एक-एक कर सबको..........................

Friday, September 5, 2008

मैं " हाइब्रिड" तकनीक का फूल हूँ

मैं जा रही थी रास्ते पर
एक फूल देखकर
हँस पड़ा
मैंने पूछा क्यों हँसे जी?
वह बोला बस यों ही
मन कहा और हँस दिया
मैंने कहा कि
क्या ऎसे कोई
राह चलतों पर हँसता है ?
वो बोला नही
पर अपने-अपने मन की बात है
मैं पूछा तो तुम क्यों हँसे
वो बोला
सुनिये मैं क्यों हँसा
जानना चाहेँगी आप
मैं इसलिये हँसा कि
आप मेरी सुन्दरता देख रही थी
खुश हो रही थीं
आप सोंच रही थीं के
मैं इतना सुन्दर हूँ
इतना सुघर हूँ
तो मैं कितना सुगन्धित होऊँगा
मैं हँस इसलिये रहा था
कि आप कितनी गलतफहमी में थीं
मैं सुन्दर ज़रूर हूँ
आँखों को आकर्षित करने की क्षमता मुझमें है
पर मुझमें मेरी मौलिकता नहीं
मेरी वह खुशुबू नही
मेरी वो सुवास नहीं
आज मैने अपनी मौलिकता
खो दी है
कृत्रिमता का लबादा पहनकर
खूबसूरत तो बन गया हूँ
पर मेरी वो सुन्दरता जिसके लिये
मैं जाना जाता था
सराहा जाता था
गायब हो गयी है
आज मैं बुके मे लगाने लायक तो हूँ
पर मन्दिर में चढ़ाने लायक नहीं
मैं " हाइब्रिड" तकनीक
का फूल हूँ
आँखो को सुन्दर लगता हूँ
नासिका में चुभता हूँ ।
दूर से ही मेरी सुन्दरता है
पास से कुरूप हूँ
इसीलिये मेरे मालिक ने
मुझे काँटों से घेरे कर रखा है
कि कोई मेरे समीप न आये
कोई मेरी वास्तविकाता न जान सके

Thursday, September 4, 2008

कश्मीर

कश्मीर जो कभी कश्यपमेरु था
आज वहाँ बारूद के पहाड़ नज़र आते हैं
जहाँ बसती थी केसर की गन्ध
आज वहाँ बारूदी गन्धे हैं
ज्ञान की पावन स्थली थी जो
पवित्रता का वास था जहाँ
देव भी ललचाते थे
जिसके लिये
जो धनपति कुबेर की थी अलकापुरी
आज वही बन्दूकों की
भयानक आवाज़ों से
अशान्त हो
क्रन्दन को विवश है
अपने पुत्रों के पलायन
और बदहाल्री को
चुपचाप सहने और
देखने को विवश है
देव जिसकी स्थिति पर
प्रसन्न हुआ करते थे
आज शोक करने को विवश है
जो गीर्वाणभारती का आलय थी
आज शब्दहीन है
अभिनवगुप्त की भूमि
विद्वानों की साधनास्थली
आज वीरान है
वहाँ पल रही हैं
बारूदी गन्धें
वहाँ उग रहीं हैं बन्दूकी फसलें
जो धरती कभी केसर उगाती थी
आज वही अपने सीने पर
बारूद की फसलें उगानें
को बाध्य है
आज उसकी सिसकियाँ भी
उसकी सन्तानें
सुन नहीं सकतीं
उसकी सिसकियाँ
शैतानों के अट्टाहासों के पीछे
खो जाने को विवश हैं
आज नही है कोई
उसके घावों पर मरहम लगाने वाला
जिसकी तरफ
वो देखती है
आशा भरी दृष्टि से
वही छिड़कता है
उसके घावों पर मरहम
भला जिस माता के पुत्र
असहाय हों
भला जिस माता के पुत्र
निरुपाय हों
कोई क्या उसकी रक्षा करता है
माँ की लाज तभी बच सकती है
जब उसकी सन्तानें सशक्त हों
अन्यथा वे कितनें भी मात्रु भक्त हों
अपनी माँ की लाज नहीं बचा सकते
बस सिसिकियाँ भर सकते हैं
और कुछ नहीं कर सकते ।

फ़रमान

साहबजी ने कुछ फ़रमान फ़रमाया है
उनके दूतों ने कहा है कि एक फतवा आया है
कही उसको तुम नज़र अन्दाज़ न कर बैठना
नही तुम्हारी शामत का अन्दाज़ा नही होगा
दूसरे दिन तुमसे कोई तकाज़ा नही होगा

कीमत

किसी चीज़ की कीमत कीमत नही होती
कीमत तो उसकी है जिसकी कोई कीमत नही होती
इसलिये हमारी कीमतों को अपनी कीमतों से मत आँकों
क्योकि हमारी कीमतों की कोई कीमत नही होती
उनकी बुलन्दियों की कीमत भी मत आँकों
क्योंकि वो तुम्हारी बुलन्दियाँ नहीं होतीं
आकाशीय पक्षियों की कीमत नहीं आँकी जाती
क्योंकि वे वो पूँजी हैं जो ज़मा नही होती

पर रेगिस्तानी काँटों का उपहार मत दिया करो

किसी परिन्दे के पर की दुहाई मत दिया करो
हमे महफिल में तन्हाई मत दिया करो
हमें मालूम है कि तुम सूरज की रोशनी नही दे सकते
पर हमे स्याह रात की गहराई मत दिया कतो
हमें मालूम है कि तुम बसन्त की बहार नही दे सकते
पर कभी खिज़ा की रुखाई मत दिया करो
नन्दनवन के फूलों की हमें चाह नही
पर रेगिस्तानी काँटों का उपहार मत दिया करो

चेहरों को नक़ाब से ढकना छोड़ दें

तुम कहते हो कि हम शाम में च़रागों को जलाना छोड़ दें
तुम कहते हो कि हम रात को महफिल में आना छोड़ दें
तुम कहते हो कि हम अपनी शहनाइयाँ बजाना छोड़ दें
तुम कहते हो कि हम इक-दूजे के कान मे फुसफुसाना छोड़ दें
तुम कहते हो कि हम बेखौफ़ गलियों में घूमना छोड़ दें
तुम कहते हो कि हम होली को रंग में नहाना छोड़ दें
तुम कहते हो कि हम अकेले में गुगुनाना छोड़ दें
तुम कहते हो कि अपना प्यारा तराना छोड़ दें
क्योंकि आज घरों के तहखानों तक दुश्मन की नज़रें है
हमारी वीरानियों औ तन्हाइयों पर भी पर भी उनके पहरें हैं
पिछले बरस के घावों पर मरहम नहीं लगा अभी
वो आतंक के दिन मेरे सर्द ज़ेहन में अभी हरे हैं
वो जख्म शोलों से गर्म है हमारे सीनों मे बन्द
कब के फूट पड़ते वे पर यहाँ छद्म सेक्यूलरों के पहरे हैं
तुम्हारी एक बात मानेगे हम नहीं न अब तलक माने हैं
आग सुलगती रहे पर हम भी सीना तानें है
हम जानते हैं इन नक़ाबों में छुपे चेहरों को
और इन के आकाओं के हाई-फाई पहरों को
और यह भी मालूम है कि इन नकाबों के पीछे
एक सर्द शैतानी चेहरा ज़र्द़ बना बैठा है
हम उस ज़र्द़ चेहरे को सर्द बना देंगे।
मत कहो हमसे कि हम गलियों में निकलना छोड़ दें
इन शैतानियों के पीछे छुपे चेहरों से कहो कि
साहस हो तो वे अपने चेहरों को नक़ाब से ढकना छोड़ दें

हमारी करतूतें

वनों को वीरान बनाकर मरुस्थलों को बोया हमनें
ज़रूरतों को बढ़ाकर हरियाली को खोया हमनें
आज हरियाली टुकड़ों में छितरायी है
इसीलिये ज़मीन पर उदासी छायी है।
अभी हम सम्हले नही अपनी आदतों से
तो धरती वीरां होकर खिज़ा हो जायेगी
अनेक कहावतें खरी उतर जायेगीं औ
हमारी आदतों की आदतें हमें सतायेंगी।
ज़रूरी है कि सम्हले हम अभी तुरत
अपनी आदतों के गुलामी से बाज़ आयें
नही आने वाले पीढ़ियाँ लताड़ेगीं हमको
ज़रा यही सोचकर हमें लाज आये॥

Monday, September 1, 2008

विमर्श

विमर्श की भी
कुछ महिमा होती है
यह
बुद्धजीवियों के हृदय में
अंकुरित होता है
अंकुरित हो
पल्ल्वित होता है
पल्लवित हो
पुष्पित होता है
पुष्पित हो
अपने परिमल सुवास से
तथाकथित बुद्धजीवी वर्ग के साथ-साथ
सभी समाचार पत्रों को
सभी पत्रिकाओं को
विश्वविद्यालयों
महाविद्यालयों
से लेकर
स्कूलों
पब्लिक स्कूलों
समस्त प्रकार की
छोटी,बडी, मझली परीक्षाओं को
अपनी गिरफ्त में समेट लेता है
और ........
जो इसमें शरीक नहीं होना चाहते
उनको भी घसीट लेता है
आजकल भी कुछ
ऎसे ही विमर्श के बादल
हमारे दृष्टि -पटल से
"विश्वपटल" तक छाये हैं
देखो ये बादल बरसकर
कीचड को धुलते हैं
या ये मात्र घडियाली आंसू हैं
वैसे आज
लोगों के आँसू सूख चुके हैं
उन्हें अब घडियाली आँसू बहाने के लिये
प्याज या ग्लिसरीन
की सख्त ज़रूरत है
आखिर उनकी भी
समाज-सुधारक की सूरत है
जिसके लिये सच्चे आँसू न सही
पर घडियाली आँसू तो
अपरिहार्य ही हैं
अन्यथा जग यह कैसे जानेगा
कि वो ही स्त्रियों और दलितों के
तारणहार हैं
वे ही उनके मुक्तिदूत हैं
कैसे दलित व स्त्री वोटबैंक पर
कब्जा हो पायेगा
जब आँख में "घडियाली" आंसू ही नहीं आयेगा ।
आखिर किसी के भावनात्मक"ब्लैकमेल" के लिये
कुछ दिखावा तो ज़रूरी ही है
क्योंकि भावनाओं को खरीदने का
आँसू प्राचीनतम हथकण्डा है
जो सबसे "सेफ"
व "दूध का धुला" है
जिससे किसी आचारसंहिता का
उल्लंघन नही होता
और कोई "ज़ेब भी ढीली" नही होती
तो .................
इससे अधिक "मुफ्त" और कुछ नही है
इसलिये विमर्श की आंधी में
अश्रु की धार बाहाया जाये
ताकि लोगों की
भावनाओं पर डाका डालकर
उन्हें
अच्छे से हथियाया जाये।