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सूर्योदय

Friday, August 29, 2008

गीता की पंक्तियाँ

जब कभी मेरा मन
उदासी के सागर की
गहराईयो में
खोने लगता है
जब वो अपनी कश्ती सहित
मँझधार में
डूबने लगता है
तब...
तब...
मुझे याद आती हैं
गीता की पंक्तियाँ
श्रीकृष्ण के उपदेश
और मेरे मन को
मिलता है
अपूर्व सम्बल
अपूर्व आत्मविश्वास
अपूर्व आशा का संसार
मेरा मन एक नई
स्फूर्ति के साथ
मँझधार से निकलने की
युक्ति सोचने लगता है
धीरे-धीरे मेरा मन और मस्तिष्क
अरुणाभा से भर उठता है
और उसमें जाग्रत होता है
एक तेज-पुञ्ज
जिसके प्रकाश से मैं,
मेरा अन्तस्
मेरा मानस
प्रकाशित हो उठता है
मेरे हृदय का अन्धकार
तिरोहित हो जाता है
और एक नये प्रकाश के साथ
एक नये विश्वास के साथ
मेरा मानस
मेरा अन्तस्
कार्य करने लगता है
अपने लक्ष्य-पथ पर बढने लगता है
तब मुझे "गीता की पंक्तियों" का
अर्थ समझ में आता है।

हमारी आदतें

हमारी आदतें
हमें सताती हैं
कभी-कभी हमें
हँसाती हैं
कभी-कभी रुलाती हैं
हमारी आदतें
हमें बदलती हैं
पर स्वयं को
बदलने में
हज़ार नखरे
दिखाती हैं
हमारी आदतें
हमारी पहचान बनना
चाहती हैं
अवसर पाकर अपना
रूप दिखाती हैं
कभी हानि
तो कभी लाभ कराती हैं
हमारी आदतें
कभी-कभी हमें भाती हैं
न बदलने को
विवश हूँ मैं
क्योंकि
हमारी आदतें
हमारे अन्तर्मन को भाती हैं।

समय

समय
समय से आता है
और अपना काम करता रहता है
वह अपने काम से
जाता है
अथवा नही
इसका ज्ञाता
मात्र विधाता है
हमें बस यही पता है
कि समय,
समय से आता है।
अपने आने में
उसने कभी आलस्य
नही किया है
तथा आज तक
अनवरत् चल रहा है
बिना भविष्य की चिन्ता किये
यदि समय आलस्य करने लगे
तो कामचोरों का
हिसाब रखकर उनको
उनकी कामचोरी की सज़ा
भला कौन देगा?
और कौन देगा
कर्मठ व्यक्तियों को
उनके कार्य का
सुपरिणाम?
इसलिये
नीर-क्षीरे विवेक को
बनाये रखने के लिये
समय निरन्तर चल रहा है
और अनन्त काल तक चलता रहेगा।

Thursday, August 28, 2008

मानस

मानस,
मेरा मानस
कभी-कभी विचारों के
सागर में डूबने लगता है
तब मुझे बहती हुई हवा में
जलता हुआ विश्वास का
प्रखर लौ से पूर्ण
चिराग दिखने लगता है ।
मेरा मानस तब
उसको पकडने को व्याकुल हो
हवा में दौडने लगता है।
पर यह यथार्थ है कि
कभी मेरा मानस
उसे पाता नहीं
हर दौड के बाद
थक-हारकर
लौट आता है
मेरे पास
जानकर यह कटु यथार्थ
कि यहां रहना है सदा
रीते हाथ।
और जब जाना है
तो भी रीते हाथ
फिर सोंचता है मानस
कि क्यों करूं
मैं व्यर्थ प्रयास ?
यही सोचता हुआ
वह विश्राम की अवस्था
में चला जाता है
धीरे-धीरे
गहरी नींद में सो जाता है
फिर अचानक उठ पडता है
नींद से विश्राम लेकर
एक नयी स्फूर्ति के साथ
और
गीता के उपदेश को शिरोधार्य कर
लग जाता है अपने काम में
और कहता है "कर्मण्येव वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"