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सूर्योदय

Thursday, September 4, 2008

कश्मीर

कश्मीर जो कभी कश्यपमेरु था
आज वहाँ बारूद के पहाड़ नज़र आते हैं
जहाँ बसती थी केसर की गन्ध
आज वहाँ बारूदी गन्धे हैं
ज्ञान की पावन स्थली थी जो
पवित्रता का वास था जहाँ
देव भी ललचाते थे
जिसके लिये
जो धनपति कुबेर की थी अलकापुरी
आज वही बन्दूकों की
भयानक आवाज़ों से
अशान्त हो
क्रन्दन को विवश है
अपने पुत्रों के पलायन
और बदहाल्री को
चुपचाप सहने और
देखने को विवश है
देव जिसकी स्थिति पर
प्रसन्न हुआ करते थे
आज शोक करने को विवश है
जो गीर्वाणभारती का आलय थी
आज शब्दहीन है
अभिनवगुप्त की भूमि
विद्वानों की साधनास्थली
आज वीरान है
वहाँ पल रही हैं
बारूदी गन्धें
वहाँ उग रहीं हैं बन्दूकी फसलें
जो धरती कभी केसर उगाती थी
आज वही अपने सीने पर
बारूद की फसलें उगानें
को बाध्य है
आज उसकी सिसकियाँ भी
उसकी सन्तानें
सुन नहीं सकतीं
उसकी सिसकियाँ
शैतानों के अट्टाहासों के पीछे
खो जाने को विवश हैं
आज नही है कोई
उसके घावों पर मरहम लगाने वाला
जिसकी तरफ
वो देखती है
आशा भरी दृष्टि से
वही छिड़कता है
उसके घावों पर मरहम
भला जिस माता के पुत्र
असहाय हों
भला जिस माता के पुत्र
निरुपाय हों
कोई क्या उसकी रक्षा करता है
माँ की लाज तभी बच सकती है
जब उसकी सन्तानें सशक्त हों
अन्यथा वे कितनें भी मात्रु भक्त हों
अपनी माँ की लाज नहीं बचा सकते
बस सिसिकियाँ भर सकते हैं
और कुछ नहीं कर सकते ।

1 comment:

मुकेश कुमार मिश्र said...

बहुत अच्छी कविता है ।
धन्यवाद