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सूर्योदय

Friday, September 5, 2008

मैं " हाइब्रिड" तकनीक का फूल हूँ

मैं जा रही थी रास्ते पर
एक फूल देखकर
हँस पड़ा
मैंने पूछा क्यों हँसे जी?
वह बोला बस यों ही
मन कहा और हँस दिया
मैंने कहा कि
क्या ऎसे कोई
राह चलतों पर हँसता है ?
वो बोला नही
पर अपने-अपने मन की बात है
मैं पूछा तो तुम क्यों हँसे
वो बोला
सुनिये मैं क्यों हँसा
जानना चाहेँगी आप
मैं इसलिये हँसा कि
आप मेरी सुन्दरता देख रही थी
खुश हो रही थीं
आप सोंच रही थीं के
मैं इतना सुन्दर हूँ
इतना सुघर हूँ
तो मैं कितना सुगन्धित होऊँगा
मैं हँस इसलिये रहा था
कि आप कितनी गलतफहमी में थीं
मैं सुन्दर ज़रूर हूँ
आँखों को आकर्षित करने की क्षमता मुझमें है
पर मुझमें मेरी मौलिकता नहीं
मेरी वह खुशुबू नही
मेरी वो सुवास नहीं
आज मैने अपनी मौलिकता
खो दी है
कृत्रिमता का लबादा पहनकर
खूबसूरत तो बन गया हूँ
पर मेरी वो सुन्दरता जिसके लिये
मैं जाना जाता था
सराहा जाता था
गायब हो गयी है
आज मैं बुके मे लगाने लायक तो हूँ
पर मन्दिर में चढ़ाने लायक नहीं
मैं " हाइब्रिड" तकनीक
का फूल हूँ
आँखो को सुन्दर लगता हूँ
नासिका में चुभता हूँ ।
दूर से ही मेरी सुन्दरता है
पास से कुरूप हूँ
इसीलिये मेरे मालिक ने
मुझे काँटों से घेरे कर रखा है
कि कोई मेरे समीप न आये
कोई मेरी वास्तविकाता न जान सके

1 comment:

मुकेश कुमार मिश्र said...

बहुत अच्छी कविता है ।
धन्यवाद