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सूर्योदय

Thursday, September 4, 2008

हमारी करतूतें

वनों को वीरान बनाकर मरुस्थलों को बोया हमनें
ज़रूरतों को बढ़ाकर हरियाली को खोया हमनें
आज हरियाली टुकड़ों में छितरायी है
इसीलिये ज़मीन पर उदासी छायी है।
अभी हम सम्हले नही अपनी आदतों से
तो धरती वीरां होकर खिज़ा हो जायेगी
अनेक कहावतें खरी उतर जायेगीं औ
हमारी आदतों की आदतें हमें सतायेंगी।
ज़रूरी है कि सम्हले हम अभी तुरत
अपनी आदतों के गुलामी से बाज़ आयें
नही आने वाले पीढ़ियाँ लताड़ेगीं हमको
ज़रा यही सोचकर हमें लाज आये॥

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