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सूर्योदय

Monday, September 1, 2008

विमर्श

विमर्श की भी
कुछ महिमा होती है
यह
बुद्धजीवियों के हृदय में
अंकुरित होता है
अंकुरित हो
पल्ल्वित होता है
पल्लवित हो
पुष्पित होता है
पुष्पित हो
अपने परिमल सुवास से
तथाकथित बुद्धजीवी वर्ग के साथ-साथ
सभी समाचार पत्रों को
सभी पत्रिकाओं को
विश्वविद्यालयों
महाविद्यालयों
से लेकर
स्कूलों
पब्लिक स्कूलों
समस्त प्रकार की
छोटी,बडी, मझली परीक्षाओं को
अपनी गिरफ्त में समेट लेता है
और ........
जो इसमें शरीक नहीं होना चाहते
उनको भी घसीट लेता है
आजकल भी कुछ
ऎसे ही विमर्श के बादल
हमारे दृष्टि -पटल से
"विश्वपटल" तक छाये हैं
देखो ये बादल बरसकर
कीचड को धुलते हैं
या ये मात्र घडियाली आंसू हैं
वैसे आज
लोगों के आँसू सूख चुके हैं
उन्हें अब घडियाली आँसू बहाने के लिये
प्याज या ग्लिसरीन
की सख्त ज़रूरत है
आखिर उनकी भी
समाज-सुधारक की सूरत है
जिसके लिये सच्चे आँसू न सही
पर घडियाली आँसू तो
अपरिहार्य ही हैं
अन्यथा जग यह कैसे जानेगा
कि वो ही स्त्रियों और दलितों के
तारणहार हैं
वे ही उनके मुक्तिदूत हैं
कैसे दलित व स्त्री वोटबैंक पर
कब्जा हो पायेगा
जब आँख में "घडियाली" आंसू ही नहीं आयेगा ।
आखिर किसी के भावनात्मक"ब्लैकमेल" के लिये
कुछ दिखावा तो ज़रूरी ही है
क्योंकि भावनाओं को खरीदने का
आँसू प्राचीनतम हथकण्डा है
जो सबसे "सेफ"
व "दूध का धुला" है
जिससे किसी आचारसंहिता का
उल्लंघन नही होता
और कोई "ज़ेब भी ढीली" नही होती
तो .................
इससे अधिक "मुफ्त" और कुछ नही है
इसलिये विमर्श की आंधी में
अश्रु की धार बाहाया जाये
ताकि लोगों की
भावनाओं पर डाका डालकर
उन्हें
अच्छे से हथियाया जाये।

1 comment:

मुकेश कुमार मिश्र said...

विमर्श पर बातों ही बातों में अच्छा विमर्श हो गया.....