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सूर्योदय

Saturday, July 16, 2016

समय चक्र बदलता है

कभी एक पल महापल बन जाता है।
मन-हृदय विकल हो घबराता है।
अनिश्चय के बादल निश्चय पर छाते हैं।
विचारों के झंझावात आते हैं, जाते हैं।
मन की शाखों को झिझोंड़कर दहलाते हैं।
समय चक्र बदलता है धूप धूल में
वही झंझावात मधुर स्मृति बन जाते हैं

हम चन्दन हैं

हम चन्दन हैं
तुम चन्दन हो
हम-तुम दोनों चन्दन हैं।
पर यह भुजंग सरीखा कौन खड़ा है
जिसने हमको आधार बना
वैमनस्य का महल गढ़ा है।।

मौलिकता


अपनी परिभाषाओं के
स्वयंभू साँचों में
हम दूसरों को कब तक
भला परिभाषित करेंगे?
कब हम जला पायेंगे
वे आत्मनिर्भर दिये
जो स्वयं स्नेह-सिंचित करेंगे?
कब हम छोड़ेंगे लत
बेवजह बैसाखियाँ लगाने की?
कब मौलिक होगी प्रक्रिया
सीखने- सिखाने की?

Friday, March 4, 2016

अर्चि के उज्ज्वल भविष्य हित स्वयं जलना आँच सा

कई बार जग की ड्योढ़ी पर
अनन्त दीप के हित
जलकर बुझ जाना होता है।
सञ्जीवनी दिन को देने हित
बलिदान बहाना होता है।।
लौ बन सके कोई इसलिए
चिन्गारी बनना पड़ता है।
लोहे को गला ढाल सके
फौलाद बन सुलगना पड़ता है।
शस्य श्यामला फसल हेतु
कभी खाद बनना पड़ता है।
किसी के उत्थान हित
दिनरात जलना पड़ता है।।
परीक्षा की घड़ी होती
सामने अपने ही होते।
आँख में जो हैं तुम्हारे
उनके वही सपने भी होते।।
तोड़ना पड़ता स्वप्न को
एक भंगुर काँच सा
अर्चि के उज्ज्वल भविष्य हित
स्वयं जलना आँच सा।।
हर बार लगता हम जले हैं।
पहले हैं जो इस ओर चले हैं।
पर अगर हम झाँकते हैं
अतीत के बिखरे गह्वर में।
तब हम ये जानते हैं
परिपाटी है यह सदियों पुरानी।
ठहरे हैं हम प्रथम प्रहर में।।
लोग ऐसे भी हुये हैं।
उत्सर्ग है गुमनाम जिनका।
पर गर्व से खड़ा है
गुमनाम भी वह नाम जिनका।।

Tuesday, February 16, 2016

वामपंथ के कुपंथ के दिन आज ढल चुके...


वामपंथ के कुपंथ के दिन आज ढल चुके।
राष्ट्रवाद रोर से जेएनयू-पट खुल चुके।।
अब राष्ट्रद्रोही फसलें यहाँ पनपने न पायेंगी।
भारत की पीढ़ियाँ यूँ भटककर यौवन न गँवायेंगी। 
देश आज जान चुका कि द्रोह यहाँ पलता है।
भारत की अभिवृद्धि से वाम-दिल जलता है।।
कांग्रेस का हाथ ले खेतियाँ जो होती थीं।
खुले हाथ से जो विषबीज बोती थीं।।
आज राष्ट्रद्रोही हाथ वे उजागर हो चुके हैं।
जो पूरे विश्व से आधार अपना खो चुके हैं।।
रक्तरंजना से इतिहास जिनका है भरा।।
आज देश ने देख लिया इनका विद्रूप चेहरा।।
ये अलगाव के बीज को बोते हुये पाये गये।
आतंक के अण्डों को सेते हुये पाये गये।।
व्याप्त है इनकी रगो में अभी जिन्ना का जिन्न।
मंशा है इनकी कि करें भारत को छिन्न-भिन्न।।
इनके मंसूबों को हम अब पलने नहीं देंगे।
JNU को आतंक का अड्डा बनने नहीं देंगे।।
इनसे कह दोशकि यदि इन्हें पाक से इतना प्यार है।
तो चले जायें पाकिस्तान इनको अधिकार है।।
जिनको भारत भारतीयता से प्यार नहीं है।
उन सर्पों को भारत में रहने का अधिकार नहीं है।।
अब इनकी रागिनी को चलने नहीं देंगे।
इन विषधर साँपों को पलने नहीं देंगे।।

Friday, June 19, 2015

अपने ऐशोआराम का इन्तजाम है ’लाल सलाम’


रोते रहे गरीबों पर,
गरीबी पर
फूस की छप्पर पर,
उससे बरसात में टपकते पानी पर
भीगते बिछौने पर
पर जब
खुद का आशियाना बनाने की बात आयी
तो वो छप्पर भी उजाड़ दिया।
रोते रहे भुखमरी पर
गरीबी पर
रोटी की तड़प पर
चूल्हे की बुझती राख पर
पर खुद के जठरानल की शान्ति के लिये
चूल्हा ही उजाड़ दिया॥
ढपली की थाप देकर
गरीबों, असहायों,
शोषितों, पीड़ितों,
दलितों एवं महिलाओं
से कन्धा लेकर,
तुमने खुद को ही उबारा है,
खुद को ही संवारा है।
स्वयं विक्रेता बनकर,
तुमने सबको बाजार में उतारा है॥
गरीबी खत्म करना,
शोषण खत्म करना,
दलितों एवं महिलाओं का
कल्याण करना
कभी तुम्हारा ध्येय न था।
तुम्हारा लक्ष्य था
गरीबी और मजबूरी को बेचना,
अधिक से अधिक उसकी बोली लगवाना,
इसलिये तुम घाव को बढ़ाते रहे,
उसे थपकी देकर रिसाते रहे,
ताकि बाजार में उसके भाव बढ़ें
और तुम मालामाल हो।
न शान्ति है
न क्रान्ति है
न मुक्ति है
कुछ् नहीं है
तुम्हारा "लाल सलाम"।
बस है अपने
एशोआराम का इन्तजाम।


Wednesday, April 15, 2015

संकल्प के स्नेह से ज्योति को नित धार दो

स्वप्न देखो
स्वप्नों को आकार दो,
संकल्प के स्नेह से
ज्योति को नित धार दो॥
देखते ही देखते
अलख जग जायेगा।
दीप-दीप जलेंगे
और जग जगमगायेगा॥
इस ज्योति की लौ को
जब पहला दान
तुम्हारा होगा,
फिर बढ़ेगे वे हाथ भी
स्नेह भरने
जिनको कण्ठ ने
कभी भी न पुकारा होगा।।
चरण चले चिन्गारी पर,
चिन्गारी भस्म बन जायेगी।
भावी पीढ़ी भर उठेगी स्वाभिमान से
ये भस्म चरणरज माथे से लगायेगी॥